नई दिल्ली | नई दिल्ली और लखनऊ में राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हो गई हैं क्योंकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हो रही है। केंद्र सरकार इस कानून को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर गंभीर सवाल उठाए हैं। हाल ही में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के बजट सत्र को तीन दिन तक बढ़ाने की घोषणा की थी ताकि वर्ष 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को 2029 से लागू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। इसके साथ ही, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी राज्यसभा में संकेत दिया कि सदन जल्द ही इस महत्वपूर्ण विधेयक पर विचार करेगा।
अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार को घेरते हुए कहा कि किसी भी नीति की नींव सटीक आंकड़ों पर आधारित होनी चाहिए। यदि महिला आरक्षण 2011 की जनगणना के पुराने आंकड़ों पर आधारित है, तो यह पूरी तरह त्रुटिपूर्ण होगा। उन्होंने कहा कि आरक्षण गणित और संख्या का विषय है, जिसका आधार जनसंख्या होती है और जनसंख्या का सही आधार जनगणना से ही मिलता है।
अखिलेश यादव ने मांग की कि पहले देश में नई जनगणना कराई जाए, उसके बाद ही महिला आरक्षण को लागू करने पर विचार किया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार महिलाओं के नाम पर राजनीतिक लाभ लेना चाहती है और यह कदम केवल दिखावा साबित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा महिला आरक्षण को एक बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में पेश कर रही है, खासकर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए। अखिलेश यादव “पहले जनगणना” की मांग के जरिए इस मुद्दे पर अपना काउंटर नैरेटिव तैयार कर रहे हैं। निष्कर्ष में, महिला आरक्षण का मुद्दा अब केवल सामाजिक न्याय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है और विपक्ष किस तरह इस मुद्दे को आगे बढ़ाता है।





