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अमेठी की संविदा शिक्षिका को हाईकोर्ट से राहत: 16 साल की सेवा के बाद हटाने के आदेश पर लगी रोक, सरकार से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अमेठी की संविदा शिक्षिका को हटाने वाले आदेश पर रोक लगाई, सरकार से संविदा शिक्षकों के नियमितीकरण की योजना पर जवाब मांगा।

India Junction News Desk
14/8/2026
अमेठी की संविदा शिक्षिका को हाईकोर्ट से राहत: 16 साल की सेवा के बाद हटाने के आदेश पर लगी रोक, सरकार से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अमेठी जिले के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में 16 साल से कार्यरत संविदा शिक्षिका अर्चना बूध को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने उनकी संविदा का नवीनीकरण रोकने वाले विभागीय आदेश को अंतरिम रूप से स्थगित करते हुए उन्हें पद पर काम जारी रखने की अनुमति दे दी है। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी पूछा है कि क्या 15 साल या उससे ज्यादा समय से संविदा पर कार्यरत शिक्षकों को नियमित करने की कोई योजना है।

2010 से लगातार कर रही थीं सेवा

याचिकाकर्ता अर्चना बूध की ओर से अधिवक्ता सक्षम अग्रवाल ने कोर्ट में दलील दी कि वे 16 जनवरी 2010 से अमेठी के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में संविदा के आधार पर शिक्षिका के तौर पर कार्यरत थीं। इतने सालों में उनकी संविदा का समय-समय पर नवीनीकरण होता रहा, और उन्होंने बिना किसी रुकावट के लगातार अपनी सेवाएं दीं। हालांकि 16 जून 2026 को विभाग ने अचानक एक आदेश जारी कर उनकी संविदा का नवीनीकरण करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्हें हाईकोर्ट का रुख करना पड़ा।

न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ का फैसला

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने की, जिन्होंने शिक्षिका के पक्ष में अंतरिम आदेश जारी करते हुए विभागीय आदेश पर रोक लगा दी, और उन्हें अपने पद पर काम जारी रखने की अनुमति दी। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि एक शिक्षक, जिसे राष्ट्र निर्माता के रूप में सम्मानित किया जाता है, उसके साथ राज्य द्वारा ऐसा व्यवहार किया जाना कि 16 साल की लंबी सेवा के बाद उसे अपने हाल पर छोड़ दिया जाए, गंभीर चिंता का विषय है।

सरकार से मांगा जवाबी हलफनामा

कोर्ट ने इस पूरे मामले को एक व्यापक और गंभीर मुद्दा मानते हुए राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि 15 साल या उससे अधिक समय से संविदा पर कार्यरत शिक्षकों के नियमितीकरण के लिए सरकार के पास कोई ठोस योजना है या नहीं। कोर्ट ने राज्य सरकार को इस बाबत जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है, और मामले की अगली सुनवाई शिक्षक दिवस (5 सितंबर) के ठीक तीन दिन बाद, 8 सितंबर को तय की है।

संविदा शिक्षकों की व्यापक समस्या की तरफ इशारा

यह मामला सिर्फ अमेठी की एक शिक्षिका तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में लंबे समय से संविदा के आधार पर काम कर रहे हजारों शिक्षकों की व्यापक समस्या की तरफ इशारा करता है। कानूनी जानकारों के मुताबिक इस तरह के मामलों में अक्सर देखा गया है कि सरकारी संस्थान वर्षों तक संविदा कर्मचारियों से नियमित शिक्षण कार्य कराते हैं, लेकिन उन्हें नियमित नियुक्ति देने के बजाय समय-समय पर सिर्फ संविदा का नवीनीकरण करते रहते हैं, जिससे उनकी नौकरी की सुरक्षा हमेशा अनिश्चित बनी रहती है।

शिक्षा जगत में मिली-जुली प्रतिक्रिया

कोर्ट के इस फैसले का शिक्षा जगत और संविदा शिक्षक संगठनों में स्वागत किया जा रहा है। कई शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह फैसला उन हजारों संविदा शिक्षकों के लिए उम्मीद की किरण है, जो वर्षों से नियमितीकरण की मांग करते आ रहे हैं। हालांकि कुछ का यह भी मानना है कि जब तक सरकार इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट और स्थायी नीति नहीं बनाती, तब तक इस तरह के मामले अदालतों में आते रहेंगे।

आगे क्या

फिलहाल अर्चना बूध अपने पद पर काम करना जारी रख सकेंगी, जब तक कि मामले की अगली सुनवाई में कोई अंतिम फैसला नहीं आ जाता। 8 सितंबर को होने वाली सुनवाई में राज्य सरकार के जवाबी हलफनामे के बाद यह स्पष्ट होगा कि सरकार संविदा शिक्षकों के नियमितीकरण को लेकर आगे क्या रुख अपनाती है। यह मामला आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के हजारों संविदा शिक्षकों के भविष्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

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