दुनिया इस समय एक बड़े तेल संकट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, वैश्विक सप्लाई चेन पर खतरे और तेजी से घटते रणनीतिक तेल भंडार ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। एक्सपर्ट्स लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर हालात नहीं सुधरते हैं, तो आने वाले समय में वैश्विक तेल बाजार बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। खास चिंता इस बात को लेकर है कि दुनिया के कई बड़े देश अपने रणनीतिक तेल भंडार यानी “ऑयल बैंक” तेजी से खाली कर रहे हैं, जबकि नए संकट की आशंका बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे बड़ा खतरा होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है। अगर किसी युद्ध या सैन्य तनाव की वजह से यह रास्ता बाधित होता है, तो वैश्विक तेल सप्लाई पर सीधा असर पड़ेगा।
मौजूदा समय में ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ता तनाव भी चिंता की सबसे बड़ी वजह बन चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मिडिल ईस्ट में सैन्य संघर्ष बढ़ता है और होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है, तो दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इससे तेल की कीमतों में रिकॉर्ड उछाल देखने को मिल सकता है। इसी खतरे को देखते हुए कई देशों ने पिछले कुछ वर्षों में अपने रणनीतिक तेल भंडार का इस्तेमाल तेजी से बढ़ाया है। कोविड महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान अमेरिका समेत कई देशों ने अपने ऑयल रिजर्व से भारी मात्रा में तेल बाजार में छोड़ा था ताकि कीमतों को नियंत्रित किया जा सके। लेकिन अब चिंता यह है कि लगातार इस्तेमाल के कारण ये भंडार पहले की तुलना में काफी कम हो चुके हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर नया वैश्विक संकट पैदा होता है, तो कई देशों के पास तेल आपूर्ति को स्थिर रखने के लिए पर्याप्त बैकअप नहीं बचेगा। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता बढ़ती दिखाई दे रही है। तेल की कीमतों में हाल के दिनों में लगातार उतार-चढ़ाव देखा गया है और निवेशकों के बीच भी चिंता बढ़ी है। सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे तेल उत्पादक देशों की भूमिका भी इस संकट में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि ये देश दुनिया के बड़े तेल निर्यातक हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अचानक वैश्विक मांग बढ़ने या सप्लाई रुकने की स्थिति में इनके लिए तुरंत उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं होगा। कई विश्लेषकों का मानना है कि तेल बाजार पहले से ही दबाव में है और किसी बड़े भू-राजनीतिक संकट से स्थिति और गंभीर हो सकती है।
भारत जैसे देशों के लिए यह संकट और ज्यादा चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है। अगर वैश्विक तेल कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो इसका असर सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। परिवहन से लेकर खाद्य पदार्थों तक लगभग हर क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि दुनिया को अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर तेजी से काम करना होगा। इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर एनर्जी और ग्रीन फ्यूल को लेकर कई देशों ने बड़े कदम उठाए हैं, लेकिन फिलहाल वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी भी तेल पर काफी हद तक निर्भर है। यही कारण है कि तेल बाजार में आने वाला हर बड़ा संकट पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करता है।
मिडिल ईस्ट की मौजूदा स्थिति को देखते हुए निवेशक और ऊर्जा कंपनियां लगातार सतर्क बनी हुई हैं। कई देशों ने अपने ऊर्जा सुरक्षा प्लान की समीक्षा शुरू कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ महीने वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अगर भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ता है, तो दुनिया को एक नए तेल संकट का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दुनिया इस संभावित संकट के लिए तैयार है? क्योंकि अगर रणनीतिक तेल भंडार लगातार घटते रहे और मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ा, तो सिर्फ तेल बाजार ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था बड़े संकट में फंस सकती है।





