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सरकारी बैंकों का एनपीए 1.9 प्रतिशत के रिकॉर्ड निचले स्तर पर

वित्त वर्ष 2025-26 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए घटकर 1.9 प्रतिशत रह गया, जबकि संयुक्त शुद्ध लाभ रिकॉर्ड 1.98 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

India Junction News Desk
6/8/2026
सरकारी बैंकों का एनपीए 1.9 प्रतिशत के रिकॉर्ड निचले स्तर पर

नई दिल्ली: भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्त वर्ष 2025-26 में परिसंपत्ति गुणवत्ता और मुनाफे के मोर्चे पर महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की है। वित्त मंत्रालय के अनुसार इन बैंकों का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात, यानी ग्रॉस एनपीए, घटकर 1.9 प्रतिशत के ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गया। इसी अवधि में सरकारी बैंकों का संयुक्त शुद्ध लाभ बढ़कर रिकॉर्ड 1.98 लाख करोड़ रुपये रहा और उनका कुल कारोबार 283 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया। ये आंकड़े बताते हैं कि पिछले कई वर्षों से बैलेंस शीट को मजबूत करने, खराब कर्ज की पहचान करने और वसूली व्यवस्था बेहतर बनाने के प्रयासों का असर अब साफ दिखाई दे रहा है।

एनपीए में कमी का क्या अर्थ है

जब किसी कर्ज की किस्त या ब्याज तय अवधि तक नहीं चुकाया जाता, तो बैंक उसे गैर-निष्पादित परिसंपत्ति की श्रेणी में रखता है। एनपीए अनुपात कम होने का सामान्य अर्थ है कि बैंक की ऋण पुस्तिका पहले की तुलना में स्वस्थ है और फंसे हुए कर्ज का हिस्सा घटा है। इससे बैंक को खराब कर्ज के लिए कम प्रावधान करना पड़ सकता है और उसके पास नए कारोबार, तकनीक तथा ग्राहक सेवाओं में निवेश के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होते हैं। हालांकि केवल एक अनुपात के आधार पर पूरी तस्वीर तय नहीं होती। बैंक की पूंजी पर्याप्तता, शुद्ध एनपीए, प्रावधान कवरेज और नए तनावग्रस्त कर्ज की गति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

रिकॉर्ड लाभ के पीछे प्रमुख कारण

सरकारी बैंकों के प्रदर्शन में सुधार के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं। पुराने खराब कर्ज की वसूली, दिवाला एवं शोधन अक्षमता व्यवस्था का उपयोग, ऋण स्वीकृति में बेहतर जांच, बड़े कर्जों की नियमित निगरानी और डिजिटल प्रक्रियाओं ने जोखिम प्रबंधन को मजबूत किया है। ब्याज से होने वाली आय में वृद्धि और शुल्क आधारित सेवाओं से मिलने वाली आमदनी ने भी लाभ को सहारा दिया। सरकार द्वारा पिछले वर्षों में किए गए पुनर्पूंजीकरण, बैंकों के विलय और प्रशासनिक सुधारों ने संस्थानों को बड़े स्तर पर काम करने तथा खर्च नियंत्रित करने में मदद की है।

कुल कारोबार का 283 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जाना यह भी दिखाता है कि जमा और ऋण, दोनों आधारों का विस्तार हुआ है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की देशभर में व्यापक शाखा मौजूदगी है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में जनधन खाते, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, कृषि ऋण, छोटे उद्योगों को वित्त और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के संचालन में इनकी बड़ी भूमिका रहती है। इसलिए उनकी वित्तीय सेहत का मजबूत होना केवल शेयरधारकों के लिए नहीं, बल्कि व्यापक अर्थव्यवस्था और वित्तीय समावेशन के लिए भी महत्वपूर्ण है।

ग्राहकों और अर्थव्यवस्था पर संभावित असर

मजबूत बैलेंस शीट वाले बैंक उद्योग, बुनियादी ढांचे, आवास, कृषि और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को जिम्मेदारी के साथ अधिक ऋण दे सकते हैं। यदि बैंक प्रतिस्पर्धी लागत पर पूंजी जुटाते हैं, तो इसका लाभ बेहतर उत्पादों और तेज डिजिटल सेवाओं के रूप में ग्राहकों तक पहुंच सकता है। स्थिर लाभ से बैंकों की पूंजी बढ़ती है और भविष्य में किसी आर्थिक झटके को सहने की क्षमता मजबूत होती है। सरकार को लाभांश के रूप में अधिक आय मिलने की संभावना भी रहती है, जिसे सार्वजनिक व्यय में इस्तेमाल किया जा सकता है।

इसके बावजूद जमा ग्राहकों और कर्ज लेने वालों के हितों के बीच संतुलन जरूरी है। जमा वृद्धि की तुलना में ऋण वृद्धि बहुत तेज होने पर तरलता पर दबाव बन सकता है। बैंकों को उचित जमा दर, पारदर्शी शुल्क, शिकायत निवारण और साइबर सुरक्षा पर लगातार ध्यान देना होगा। डिजिटल बैंकिंग के विस्तार के साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी, फर्जी ऋण ऐप और पहचान की चोरी जैसे जोखिम भी बढ़े हैं। बेहतर वित्तीय नतीजों का वास्तविक लाभ तभी माना जाएगा जब ग्राहक सुरक्षा और सेवा गुणवत्ता में भी समान सुधार दिखाई दे।

आगे की चुनौतियां

एनपीए का ऐतिहासिक निचला स्तर उत्साहजनक है, लेकिन बैंकों के लिए सावधानी बनाए रखना जरूरी है। वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता, कमोडिटी कीमतों में बदलाव, जलवायु से जुड़ी घटनाएं और कुछ उद्योगों में मांग की कमजोरी कर्ज चुकाने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। असुरक्षित खुदरा ऋण की तेज वृद्धि तथा छोटे कर्जों में संभावित तनाव पर भी नियामक निगरानी आवश्यक होगी। बैंक यदि केवल बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए ऋण मानकों को कमजोर करते हैं, तो वर्तमान सुधार भविष्य में पलट सकता है।

विशेषज्ञों के लिए अगला अहम संकेत यह होगा कि नए खराब कर्ज बनने की दर कितनी नियंत्रित रहती है और वसूली का कितना हिस्सा वास्तविक नकद प्राप्ति से आता है। बट्टे खाते में डाले गए कर्ज की वसूली, बड़े उधारकर्ताओं पर निगरानी और स्वतंत्र बोर्ड की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी। साथ ही बैंकों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित जोखिम मॉडल अपनाते समय डेटा की गुणवत्ता, निष्पक्षता और ग्राहक की निजता सुनिश्चित करनी होगी।

कुल मिलाकर 1.9 प्रतिशत का सकल एनपीए और 1.98 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था में आए बदलाव का मजबूत संकेत है। अब चुनौती इस उपलब्धि को टिकाऊ बनाने, जिम्मेदार ऋण वृद्धि जारी रखने और आम ग्राहक तक बेहतर सेवा पहुंचाने की है। यह रिपोर्ट वित्त मंत्रालय और पत्र सूचना कार्यालय द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। पाठक मूल विवरण PIB की आधिकारिक वेबसाइट पर देख सकते हैं।

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