तमिलनाडु विधानसभा ने बुधवार को प्रस्तावित परिसीमन (डिलिमिटेशन) प्रक्रिया के खिलाफ एक विशेष प्रस्ताव पारित किया, जिसमें केंद्र सरकार से लोकसभा सीटों की मौजूदा संख्या 543 पर स्थायी रूप से बरकरार रखने की मांग की गई है। मुख्यमंत्री विजय द्वारा पेश इस प्रस्ताव को DMK का भी समर्थन मिला, वहीं कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम और वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने भी इसे अपना पूरा समर्थन दिया है।
क्या मांगा गया है प्रस्ताव में
तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित इस प्रस्ताव में केंद्र सरकार से अनुरोध किया गया है कि लोकसभा सदस्यों की कुल संख्या मौजूदा 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखी जाए, राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का मौजूदा अनुपात आधारित बंटवारा स्थायी तौर पर बरकरार रखा जाए, और वर्तमान अनुपात को बिना किसी बदलाव के जारी रखा जाए। इसके अलावा प्रस्ताव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को मौजूदा 543 सीटों के आधार पर ही 2029 के लोकसभा चुनाव में लागू करने की मांग भी की गई है।
कार्ति चिदंबरम बोले- 'बड़ी संसद कम असरदार होगी'
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने इस प्रस्ताव को अपना पूरा समर्थन देते हुए कहा, "मैं इस प्रस्ताव का पूरी तरह समर्थन करता हूं। एक बड़ी संसद कम असरदार संसद साबित होगी। बड़ी संसद का मतलब यह नहीं कि वह लोकतंत्र की बेहतर सेवा कर रही है।" उन्होंने आगे कहा कि विभिन्न राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का मौजूदा संतुलन बरकरार रहना चाहिए, ताकि संघीय व्यवस्था में निष्पक्षता बनी रहे। उन्होंने कहा, "हमें संसद की सीमा तय करनी चाहिए और राज्यों के प्रतिनिधित्व का मौजूदा अनुपात भी बनाए रखना चाहिए।"
पी. चिदंबरम की चेतावनी- 'वरना बन जाएगी चीन की संसद जैसी'
वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने इस मुद्दे पर और तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि दक्षिणी राज्यों को, जिनमें तमिलनाडु भी शामिल है, बीते 25 सालों में परिवार नियोजन नीतियों को सफलतापूर्वक लागू करने की सजा के तौर पर अपना राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं गंवाना चाहिए। उन्होंने कहा, "लोकसभा को 543 सीटों पर स्थिर रखा जाना चाहिए, वरना यह चीन की संसद जैसी बन जाएगी। यह एक सार्वजनिक सभा बन जाएगी, सदन नहीं रह जाएगी।" उन्होंने यह भी बताया कि तमिलनाडु विधानसभा ने पहले ही तमिल गीत और FCRA को लेकर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किए थे।
झारखंड मुद्दे पर भी उठाया सवाल
इसी बातचीत के दौरान पी. चिदंबरम ने झारखंड में हुए विरोध प्रदर्शनों को लेकर भी सवाल उठाए, जहां विपक्ष पुलिस कार्रवाई पर जवाबदेही की मांग कर रहा है। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या गृह मंत्री अमित शाह संसद में अपने नाम से सूचीबद्ध दो बिलों को पेश करने के लिए सदन में मौजूद रहेंगे। इसके अलावा केंद्रीय राज्य मंत्री संजय सेठ ने भी झारखंड सरकार पर JPSC-JSSC विवाद की CBI जांच रोकने का आरोप लगाते हुए इसे ₹400 करोड़ का घोटाला करार दिया।
DMK ने भी दिया समर्थन, लेकिन उठाए सवाल
गौरतलब है कि तमिलनाडु में परिसीमन का विरोध कोई नया मुद्दा नहीं है। इससे पहले DMK सरकार भी लगातार इस मुद्दे को उठाती रही है, और फरवरी 2024 में तमिलनाडु विधानसभा ने इसी तरह का प्रस्ताव सबसे पहले पारित किया था। हालांकि DMK नेता एलंगोवन ने मौजूदा मुख्यमंत्री विजय के इस प्रस्ताव पर तंज कसते हुए कहा कि "हमने जो पहले कहा था, वही अब वे भी दोहरा रहे हैं।" यह दिखाता है कि भले ही सत्ता पक्ष बदल गया हो, लेकिन परिसीमन को लेकर राज्य की चिंता और मांग में कोई बदलाव नहीं आया है।
दक्षिणी राज्यों की साझा चिंता
परिसीमन को लेकर सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और तेलंगाना जैसे अन्य दक्षिणी राज्यों में भी यह चिंता लंबे समय से बनी हुई है। इन राज्यों का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल करने के बावजूद अगर परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होता है, तो उन्हें संसद में अपने प्रतिनिधित्व में कमी का सामना करना पड़ सकता है, जबकि उत्तर भारत के राज्यों को इसका फायदा मिलेगा।
आगे क्या
फिलहाल यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में लगातार गर्माता जा रहा है, और आने वाले समय में अन्य दक्षिणी राज्यों की तरफ से भी इसी तरह के प्रस्ताव पारित होने की उम्मीद जताई जा रही है। यह देखना अहम होगा कि केंद्र सरकार इस व्यापक विरोध पर क्या रुख अपनाती है, और क्या परिसीमन प्रक्रिया को लेकर कोई समझौते की राह निकलती है, जो सभी राज्यों को स्वीकार्य हो।





