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बंगाल चुनाव 2026: ‘यूपी स्टाइल एनकाउंटर’ बयान पर सियासी घमासान, Dilip Ghosh के बयान से गरमाई राजनीति

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 से पहले Dilip Ghosh के “यूपी स्टाइल एनकाउंटर” बयान ने सियासत गरमा दी है। All India Trinamool Congress ने कड़ा विरोध दर्ज कराया, जानिए पूरा मामला।

India Junction News Desk
27/3/2026
बंगाल चुनाव 2026: ‘यूपी स्टाइल एनकाउंटर’ बयान पर सियासी घमासान, Dilip Ghosh के बयान से गरमाई राजनीति

Dilip Ghosh के एक बयान ने West Bengal Assembly Election 2026 के माहौल को अचानक बेहद गर्म और टकरावपूर्ण बना दिया है। खड़गपुर की एक रैली में उन्होंने कहा कि अगर बंगाल में बीजेपी की सरकार बनती है तो अपराधियों के खिलाफ “यूपी स्टाइल एनकाउंटर” लागू किया जाएगा, जैसा कि Uttar Pradesh में देखने को मिलता है। इस बयान के साथ ही उन्होंने मौजूदा सरकार पर आरोप लगाया कि पुलिस राजनीतिक दबाव में काम कर रही है और अपराधियों पर सख्ती नहीं हो रही। इस बयान को बीजेपी के “कानून-व्यवस्था सुधार” के एजेंडे के रूप में पेश किया गया, लेकिन इसके तुरंत बाद सियासत में बड़ा बवाल शुरू हो गया।

सत्ताधारी All India Trinamool Congress (TMC) ने इस बयान को बेहद खतरनाक और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए कड़ा विरोध किया। पार्टी ने चुनाव आयोग से शिकायत करते हुए कहा कि इस तरह का बयान हिंसा को बढ़ावा देता है और चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करता है। TMC नेताओं का कहना है कि बीजेपी बंगाल में “कानून का राज” नहीं बल्कि “एनकाउंटर राज” लाना चाहती है, जो संविधान और न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है। इस बयान के बाद दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो गए हैं, जिससे चुनावी माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो गया है।

इसी बीच ज़मीनी हालात भी इस राजनीतिक तनाव को और बढ़ा रहे हैं। राज्य के कई हिस्सों, खासकर दक्षिण 24 परगना जैसे इलाकों में बीजेपी और टीएमसी समर्थकों के बीच झड़पें देखने को मिली हैं, जिनमें हिंसा और पुलिस हस्तक्षेप की खबरें भी सामने आई हैं। यह साफ संकेत है कि 2026 का बंगाल चुनाव सिर्फ राजनीतिक मुकाबला नहीं बल्कि वर्चस्व की लड़ाई बनता जा रहा है। ऐसे में “यूपी मॉडल” अब सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि चुनावी नैरेटिव का केंद्र बन चुका है—जहां एक तरफ इसे सख्त कानून-व्यवस्था का प्रतीक बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा कहा जा रहा है। अब देखना दिलचस्प होगा कि यह मुद्दा वोटरों को कितना प्रभावित करता है और क्या यह बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित होता है या उल्टा पड़ता है।

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